आज की दुनिया में इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ, मोबाइल फोन और रिन्यूएबल एनर्जी स्टोरेज हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इन सबकी रीढ़ मानी जाने वाली लिथियम-आयन बैटरियाँ एक बड़ी समस्या से जूझ रही हैं। ज़्यादातर आधुनिक बैटरियाँ Nickel और Cobalt जैसे महंगे, सीमित और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक मटीरियल पर निर्भर हैं। अब वैज्ञानिकों ने इसी समस्या का ऐसा समाधान ढूंढ निकाला है, जो सुनने में अजीब लगे लेकिन बेहद क्रांतिकारी है. उन्होंने जंग यानी रस्ट से ऐसी बैटरी बनाई है, जो समय के साथ और ज़्यादा ताकतवर होती जाती है।

जंग से बनी बैटरी का अनोखा विज्ञान
जर्मनी की Saarland University और ऑस्ट्रिया की University of Salzburg के वैज्ञानिकों ने मिलकर एक नया लिथियम-आयन बैटरी एनोड विकसित किया है, जिसमें आयरन ऑक्साइड का इस्तेमाल किया गया है। आयरन ऑक्साइड दरअसल वही पदार्थ है जिसे हम आम भाषा में जंग कहते हैं। इस बैटरी की खासियत यह है कि इसमें आयरन ऑक्साइड को बेहद छोटे, खोखले और छिद्रदार कार्बन स्ट्रक्चर के अंदर डाला गया है, जिन्हें माइक्रोस्कोपिक कार्बन स्फियर कहा जाता है। ये स्फियर लगभग 250 नैनोमीटर के होते हैं और इनका सतह क्षेत्र बहुत बड़ा होता है, जिससे इलेक्ट्रोकेमिकल परफॉर्मेंस बेहतर हो जाती है।
इस डिज़ाइन की प्रेरणा भी दिलचस्प है। शोधकर्ताओं ने ऑस्ट्रिया की मशहूर मिठाई “Mozartkugeln” से आइडिया लिया, जिसमें अलग-अलग परतें होती हैं और बाहर से चॉकलेट की कोटिंग होती है। इसी तरह, कार्बन की बाहरी परत के अंदर आयरन के कण भरे गए हैं जो धीरे-धीरे बैटरी के इस्तेमाल के दौरान आयरन ऑक्साइड में बदलते जाते हैं।
इस्तेमाल के साथ बढ़ती पावर, 300 साइकल में फुल कैपेसिटी
आमतौर पर बैटरियों की क्षमता समय के साथ घटती है, लेकिन इस नई बैटरी में ठीक उल्टा होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जैसे-जैसे बैटरी चार्ज-डिस्चार्ज साइकल से गुजरती है, वैसे-वैसे इसकी स्टोरेज कैपेसिटी बढ़ती जाती है। इसकी वजह यह है कि शुरुआत में मौजूद धात्विक आयरन धीरे-धीरे ऑक्सीजन के साथ प्रतिक्रिया करके आयरन ऑक्साइड बनाता है। यह प्रक्रिया एकदम से पूरी नहीं होती, बल्कि लगभग 300 चार्ज-डिस्चार्ज साइकल के बाद बैटरी अपनी अधिकतम क्षमता तक पहुँचती है।
इसका मतलब यह है कि बैटरी को जितना ज़्यादा इस्तेमाल किया जाए, वह उतनी ही बेहतर परफॉर्म करने लगती है। यह गुण पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरियों से बिल्कुल अलग है, जहाँ क्षमता धीरे-धीरे कम होती जाती है। आयरन का एक और बड़ा फायदा यह है कि यह दुनिया भर में आसानी से उपलब्ध है, सस्ता है और इसे रीसायकल करना भी आसान है, जिससे पर्यावरण पर दबाव कम पड़ता है।
भविष्य की एनर्जी स्टोरेज का नया रास्ता
हालाँकि यह तकनीक अभी रिसर्च स्टेज में है और इसे बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले कुछ चुनौतियाँ बाकी हैं। वैज्ञानिक चाहते हैं कि आयरन के पूरी तरह सक्रिय होने की प्रक्रिया को तेज़ किया जाए, ताकि बैटरी जल्दी फुल कैपेसिटी तक पहुँच सके। फिलहाल यह मटीरियल सिर्फ एनोड के रूप में दिखाया गया है, यानी एक पूरी बैटरी बनाने के लिए अभी सही कैथोड के साथ इसे जोड़ना होगा।
फिर भी, शोधकर्ताओं को भरोसा है कि यह तकनीक भविष्य में पर्यावरण-अनुकूल एनर्जी स्टोरेज सिस्टम का रास्ता खोल सकती है, खासकर रिन्यूएबल एनर्जी के लिए। इसके अलावा, इसी मटीरियल को सोडियम-आयन बैटरियों में भी आज़माया जा रहा है, जिन पर पहले से ही कई ऑटोमोबाइल कंपनियाँ काम कर रही हैं। अगर यह प्रयोग सफल होता है तो आने वाले समय में निकल और कोबाल्ट पर हमारी निर्भरता कम हो सकती है और जंग से बनी बैटरी ऊर्जा की दुनिया में एक नया अध्याय लिख सकती है।
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